Friday, 21 February 2020

हर एक दौर का यही अंजामे-इश्क है


हर एक दौर का यही अंजामे-इश्क है 

लैला महलों मे ब्याही गई है .. मजनू सड़क पे मरा है


“ख़ाली पन्ने वैचारिक अभाव के लिखित दस्तावेज़ हैं।”


कितनी खामोश 
मुस्कुराहट थी..

शोर बस आंखो कि 
नमी में था!


मेरी ख़ुशी तुम्हें पाने से ज़्यादा,
तुम्हें हमेशा खुश देखने में है !



हमारी ज़िन्दगी में कमाई की कोई 
निश्चित परिभाषा नहीं होती है....
अनुभव, रिश्ते, मान सम्मान और 
सबक, सब कमाई के ही रूप हैं..

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